खाना ट्रेन में ही इतना क्यों आकर्षित करता है ?

7:00 pm 29 Sep, 2016


ट्रेन में शाम और रात के दरम्यानी समय खाने के शौकीन लोगों के लिए बे-रहम होता है। बे-रहम इसलिए क्योंकि आत्मघात के अलावा कोई चारा नहीं बचता और इसमें आपकी मदद खुद खाने वाला भी नहीं कर सकता। शिष्टाचार में खाने वाले पड़ोस में बैठे या ऊपर की बर्थ पर टंगे होने वाले सहयात्री से खाने के लिए पूछ भी ले, तो पहली बार मुंह से न ही निकलेगा। और दोबारा या बार-बार पूछने वाले बिरले ही मिलते हैं।

दिन ढलने के बाद ट्रेन की आवा-जाही के हिसाब से दस्तरख्वान बदल जाते हैं। मसलन ट्रेन हावड़ा/वाराणसी या सुल्तानपुर से अमृतसर/देहरादून/दिल्ली की ओर जा रही है, तो खाने की पन्नियों से पूड़ी सब्जी,लिट्टी या झाल मूरी निकलती है। वहीं, अगर ट्रेन अमृतसर से आ रही हो तो अधिकतर सफ़ेद कपड़े में लिपटी रोटी या पराठे , स्टील के डिब्बे में करेले/कद्दू/आलू गोभी/सूखे आलू की सब्ज़ी निकलती है। दिल्ली से वापसी कर रही ट्रेनों में अधिकतर रस्ते का माल होता है।

खाना चाहे जैसा भी हो, बोगी में खाना खुलते ही माहौल बदल जाता है। जो खाने जा रहे हैं, वे आपा खो देते हैंं। और जो नहीं खा पाते, उनकी आंखें खाने के प्रति अश्लील हो जाती हैं। कनखियों से खाना और खाने वाले को देखती वहशी नज़रें कैंडिड हो जाती हैं। यहीं से न खा पाने वाला मुंह रसीला होता रहता है।आइए इनका अलग-अलग विश्लेषण किया जाए।

अचार

सबसे ज्यादा जुल्मी तो अचार होता है। पूरब के अचार की मारक क्षमता अत्यधिक होती है। मिर्ची/आम/कटहल के अचार में जो मसाले होते हैं, उनकी खुशबू अलग अलग साया होती है। दिल्ली, पंजाब और जम्मू के तरफ से आने वाले अचार एसी कोच में ही जलवा कायम रख पाते हैं। बाकी स्लीपर और जनरल कोच में उनकी दम निकल जाती है। अचार ट्रेन में खाये जाने वाले वाले लगभग हर खाने के साथ जरूर होता है। यहाँ तक झाल मूरी (लाई/दालमोठ/नमकीन बेसन के सेव) के साथ भी प्रायः अचार का प्रयोग होता है।

लिट्टी

लिट्टी चावल की हो या आंटे की उसके अंदर का भरावन गजब महकता है। कभी लहसुन या कभी प्याज का बेस लिए पता नहीं, कितने तरीके के मसाले और राई से नथुने फूल जाते हैं। फुस-फुस टाइप का भरावन पहले कौर से भरभराकर जरूर गिरता है। दुसरे या तीसरे कौर में सम्भलता है। लिट्टी के साथ हरा मरचा (हरी मिर्च) रेगिस्तान में पोखर-कुएं के शीतल जल सा दिखता है।

beingdesh

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पराठे/पूड़ी

पंजाब और दिल्ली की तरफ से आने वाले पराठे परोंठे हो जाते हैं। यानी की मोटे-मोटे। पराठों की सारी परतें अत्यधिक तेल के कारण अलग-अलग सी लगती हैं। उसकी ऊपरी परत काफी चमकदार होती है। वहीं, पूरब से आने वाले पराठे बड़े बड़े, पतले से। पूड़ी में भी अंतर होता है। कहीं पूड़ी सूखी बड़ी-बड़ी गहरे रंग में, तो कहीं मोयन पड़ी हुई कुछ कुछ सफ़ेद पूड़ी। हां, इधर आलू के पराठे कम दिखते हैं।

शायद अब लोगों का सफ़र सफ़र नहीं रहता ट्रैवल होता है। लेकिन कुछ भी हो खाना खुलेगा, तो उसकी मतवाली खुशबू आपकी नियत में खोट जरूर पैदा कर देती है। आपको एक सवाल के सवाल के साथ छोड़े जा रहा हूँ।

क़्वेसचन— खाना ट्रेन में ही इतना क्यों आकर्षित करता है ?

 

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