यहां बैन के बावजूद भी कराई जाती है मुर्गों की लड़ाई; उड़ाते हैं कानून की धज्जियां

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5:50 pm 14 Jan, 2016

आप मानिए या न मानिए, लेकिन यह सच है कि आंध्र प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में कॉकफाइट (मुर्गों की लड़ाई) जैसे खूनी खेल के लिए वहां एक मुर्गे पर लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं। इस राज्य में अवैध होने के बावजूद भी यह खूनी खेल संक्रांति के दौरान ग्रामीण इलाकों में खेला जाता है, जिसमें करोड़ो रुपए दांव पर लगते हैं और तब यह खेल एक व्यापार बन जाता है।

इसमें बड़े-बड़े खेतों में मुर्गों की भिड़त के लिए अखाड़े बनाए जाते हैं। मुर्गों पर बोलियाँ लगाई जाती है। इस लड़ाई में मुर्गें एक-दूसरे पर हमला करते है और इसी समय मुर्गों पर सट्टा लगाने वाले लोग करोड़ो रुपए कमाते हैं।

मुर्गों के अंगों पर तेज धार वाले ब्लेड लगाए जाते हैं, क्योंकि इस खूनी खेल में यही इनका एक मात्र हथियार होता है, जिससे वह एक-दूसरे पर हमला कर सकते हैं। इस लड़ाई में मुर्गें तब तक लड़ते रहते हैं, जब तक एक की मौत न हो जाए या दूसरा लड़ने में असमर्थ न हो जाए।

गौरतलब है कि राज्य में कॉकफाइट (मुर्गों की लड़ाई) जीव हिंसा अधिनियम ऐक्ट, 1960 और आन्ध्र प्रदेश गेमिंग ऐक्ट, 1974 के तहत बैन है। फिर भी धड़ल्ले से इसका आयोजन किया जाता रहा है।

पश्चिमी गोदावरी जिला अपने जलीय कृषि तालाबों और हरे-भरे खेतों के लिए जाना जाता है, तो वहीं यहां कॉकफाइट पर करीब 200 करोड़ रुपए लगते हैं। पड़ोसी जिले कृष्णा और गुंटूर इस सट्टे के खेल में दूसरे स्थान पर हैं।

इन मुर्गों पर बड़ी राशि लगाने वाले आयोजक इन्हें लड़ाई के लिए तैयार करने में कई लाखों रुपए खर्च करते हैं। इन मुर्गों के खाने-पीने का विशेष ख्याल रखा जाता है।

इनका आहार संतुलित होता है, और डाइट चार्ट विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया जाता है। जैसे ही दिन शुरू होता है वैसे ही इन लड़ाकू मुर्गों को लड़ाई के लिए तैयार करने की जद्दोजहत शुरू हो जाती है।

दिन शुरू होते ही इन्हें बादाम, काजू, दाल दी जाती है। कुछ घंटों बाद कीमा दिया जाता है। इतना ही नही, उन्हें ताकत बढ़ाने वाले हार्मोन्स के इंजेक्शन और लड़ाई के दौरान होने वाली चोटों से उबरने के लिए एंटीबायोटिक भी दिए जाते हैं। इन मुर्गों की कीमत जानकार आप हैरान रह जाएंगे, इनमें से कुछ मुर्गों की कीमत 4 लाख रुपए तक होती है।


इस मुर्गों के खूनी खेल में शामिल गुंटूर जिले का एक पोल्ट्री असिस्टेंट कहता है:

“हम मुर्गों को कई तरह के पौष्टिक आहार खिलाते हैं ताकि वह लड़ाई में सक्षम रहे और अपने मालिक को पूरा पैसा वसूल करा सके।”

लड़ाकू मुर्गों को रोज़ इस खेल के लिए तैयार करने के लिए ट्रेनिंग भी दी जाती है। दोपहर में अंडे खिलाए जाते हैं और शाम को अनाज और सूखे मेवे परोसे जाते हैं। पोल्ट्री सहायक इन मुर्गों के स्वास्थ्य पर चौबीसों घंटे नज़र रखते हैं और इन्हें अति आक्रमक बनाने के लिए हार्मोन इंजेक्शन देते हैं।

गुंटूर के पेडक्कनी गांव के पी नागराजू बताते हैं:

“यह अजीब लग सकता है कि 4-5 किलो वजन के मुर्गे के लिए लोग 4-5 लाख रुपए खर्च कर देते हैं, लेकिन अगर मुर्गा लड़ाई जीत जाता है, तो कीमत से काफी ज्यादा पैसा मिल जाता है, क्योंकि सट्टे की राशि काफी ज्यादा होती है। आयोजक लागत की राशि से 10 गुना ज्यादा पैसा कमाते हैं। “

हैदराबाद हाई कोर्ट ने इस खेल पर प्रतिबन्ध तो लगा दिया था लेकिन यह अब भी अबाध जारी है। इस संबंध में सरकार को भी पता है। प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी टीडीपी के सांसद वेंकटेश्वर राव ने बुधवार को पश्चिमी गोदावरी जिले के एलुरु स्टेडियम में मुर्गों की लड़ाई के आयोजन का उद्घाटन किया। इस घटना को देखते हुए कहा जा सकता है कि जब सरकार के मंत्री ही नियम तोड़ने पर लगे हुए हैं, तब बाकी लोगों के बारे में क्या कहा जा सकता है।

इस खूनी खेल को कहीं से भी मनोरंजक तो नहीं कह सकते, बल्कि यह सट्टेबाजी का केंद्र है।

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