भारत की ऐसी दरगाह जहां मुसलमान भी धूमधाम से मनाते हैं जन्माष्टमी का उत्सव

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5:53 pm 23 Aug, 2016


पूरी दुनिया में भारत को पारंपरिक और सांस्कृतिक उत्सव के देश के रूप में जाना जाता है, क्योंकि यह बहुधर्मी और बहुसंस्कृति का देश है। भारत में कोई भी हर महीने उत्सवों का आनन्द ले सकता है। इन उत्सवों और त्योहारों से भारत की अतुल्य सांस्कृतिक विरासत का अहसास होता है। पर जब बात हो इन सभी पर्वों को धर्म और कट्टरवाद से परे जाकर मिलजुल कर भाईचारे से खुशियां मनाने और बांटने की, तो यह मिसाल सिर्फ भारत में ही देखने को मिल सकती है।

कुछ ऐसी ही मिसाल राजस्थान की राजधानी जयपुर से 200 किलोमीटर दूर झुंझुनू जिले के चिरवा स्थित नरहर दरगाह पर देखने को मिलती है। यहां मुस्लिम समुदाय के लोग दरगाह में जन्माष्टमी पर्व ईद की तरह मानते हैं।

नरहर दरगाह जिसे शरीफ हजरत हाजिब शकरबार दरगाह के नाम से भी जाना जाता है, का जन्माष्टमी उत्सव देखने लायक होता है। त्योहार से कुछ दिन पहले से ही दरगाह के आस-पास की 400 से ज्यादा दुकानों को सजाया जाता है। सिर्फ़ इतना ही नहीं, जन्माष्टमी की रात यहां अलग-अलग तरह के उत्सव भी आयोजित किए जाते हैं।

श्री कृष्ण के जन्म उत्सव को ख़ास बनाने के लिए इस दरगाह को मुस्लिम समुदाय के लोग मंदिर की तरह सजाते हैं और कव्वाली, नृत्य और विभिन्न नाटकों का आयोजन भी करते हैं।

दरगाह के सचिव उस्मान अली कहते हैंः

“यह कहना बेहद मुश्किल है कि यह त्योहार कब और कैसे शुरू हुआ, लेकिन इतना जरूर है कि यह राष्ट्रीय एकता की सच्ची तस्वीर पेश करता है। क्योंकि त्योहार को यहां हिंदू, मुस्लिम और सिख साथ मिलकर मनाते हैं।”

दरगाह की गुम्बद से बरसती थी शक्कर

मान्यता है कि पहले यहां दरगाह की गुम्बद से शक्कर बरसती थी। इसी कारण यह दरगाह शक्करबार बाबा के नाम से भी जानी जाती है। शक्करबार शाह अजमेर के सूफी संत ख्वाजा मोइनुदीन चिश्ती के समकालीन थे तथा उन्हीं की तरह सिद्ध पुरुष थे। शक्करबार शाह ने ख्वाजा साहब के 57 वर्ष बाद देहत्याग किया था। 


नवविवाहित जोड़ों का इस दरगाह के प्रति काफी आस्था होती है। ऐसी मान्यता है कि यहां आकर माथा टेकने से उनका वैवाहिक जीवन खुशहाल और दीर्घायु रहता है। स्थानीय लोगों की मानें तो उनको यहां आकर अध्यात्मिक और मानसिक शांति की प्राप्त होती है।

हालांकि, यह कह पाना मुश्किल है कि इस दरगाह में जन्माष्टमी पर्व को मनाने की परंपरा कब से शुरू हुई, लेकिन जनश्रुति के अनुसार यह उत्सव पिछले 300-400 वर्षों से धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस उत्सव को दरगाह में मनाए जाने के पीछे मंशा हिंदुओं और मुस्लिमों में भाईचारे को बढ़ावा देना है।

त्योहार के इस दरगाह में हज़ारों की संख्या में देश के विभिन्न कोने जैसे बिहार, महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश आदि से लोग आते हैं और दरगाह में फूल, चादर, नारियल और मिठाइयां अर्पित कर मन्नते मांगते हैं।

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