जानिए उत्तर प्रदेश, बिहार के ख़तरनाक माफ़िया श्रीप्रकाश शुक्ला की कहानी

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11:55 am 25 Feb, 2016

90 के दशक में पूर्वान्चल यानी उत्तर प्रदेश के अखबारों के पन्नों पर दहशत का साया साफ दिखाई पड़ता था। हत्या, अपहरण, डकैती और अवैध उगाही में एक खास नाम की वजह से न केवल आम आदमी परेशान था, इस नाम ने प्रशासन के नाक में दम कर रखा था।

नाम तो सबने सुना था, लेकिन उसकी कोई तस्वीर पुलिस के पास नहीं थी। दहशत का दूसरा नाम था कुख्यात माफिया – श्रीप्रकाश शुक्ला।

2016-02-24

श्रीप्रकाश शुक्ला गोरखपुर के ममखोर गांव में पैदा हुआ था। कुश्ती का शौकीन शुक्ला अपने गांव का जानामाना पहलवान था। उसने वर्ष 1993 में पहली बार, राकेश तिवारी नामक एक व्यक्ति की हत्या इसलिए कर दी थी, क्योंकि तिवारी ने उसकी बहन से छेड़छाड़ की थी।

इस घटना के बाद वह बैंकॉक भाग गया। जब वह लौटा तो बिहार के सूरजभान सिंह के गैंग में शामिल हो गया। फिर यही से शुरू हुआ श्रीप्रकाश शुक्ला का आपराधिक सफर।

1997 के शुरुआती दौर में तब वीरेन्द्र शाही की हनक थी। शाही की पकड़ राजनीतिज्ञ और अपराध जगत के लोगों में बराबर की थी। कहा जाता है कि उस वक़्त हरि शंकर तिवारी शाही का प्रतिद्वंद्वी था। और यह भी माना जाता है कि हरि शंकर तिवारी की ही शह पर श्रीप्रकाश शुक्ला ने शाही की हत्या की थी।

13 जून 1998 को श्रीप्रकाश शुक्ला ने पटना स्थित इंदिरा गांधी हॉस्पिटल के बाहर बिहार सरकार के तत्कालीन मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की गोली मारकर हत्या कर दी। सिक्युरिटी गार्ड्स के मौजूद होने के बावजूद मंत्री की हत्या प्रशासन के लिए अपमानजक था।

मंत्री बृज बिहारी प्रसाद लाल बत्ती की कार से उतरे ही थे कि एके 47 से लैस श्रीप्रकाश और उसके 4 साथियों ने उन पर फायरिंग शुरु कर दी।

इस कत्ल के साथ ही श्रीप्रकाश ने अपने मंसूबे साफ तौर पर ज़ाहिर कर दिए थे। अब पूरब से पश्चिम तक रेलवे के ठेकों पर कोई और हक़ नहीं जता सकता था। बिहार के मंत्री के कत्ल की गुत्थी उत्तर प्रदेश की पुलिस अभी सुलझा ही रही थी कि तभी एक खबर से पुलिस दहशत में आ गई।

दरअसल श्रीप्रकाश शुक्ला ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सुपारी ले ली थी। 6 करोड़ रुपए में मुख्यमंत्री की सुपारी लेने की खबर ने एसटीएफ की नींद उड़ा कर रख दी।

इस तरह हुई पहली मुठभेड़


पुलिस की श्रीप्रकाश शुक्ला से पहली मुठभेड़ 9 सितंबर 1997 को लखनऊ में हुई। पुलिस को अपने एक मुखबीर से यह सूचना मिली थी कि शुक्ला अपने कुछ दोस्तों के साथ एक सलून में बाल कटवाने जा रहा है। इस मुठभेड़ में पुलिस को कामयाबी नहीं मिली, उल्टा पुलिस का एक जवान शहीद हो गया।

शुक्ला से निपटने के लिए बना एसटीएफ

लखनऊ स्थित सचिवालय में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, गृहमंत्री और डीजीपी की एक गोपनीय बैठक हुई, जिसमें यह निर्णय लिया गया कि उत्तर प्रदेश की बन रही आपराधिक छवि को सुधारने के लिए एक स्पेशल फोर्स (STF) का गठन किया जाए।

4 मई 1998 को उत्तर प्रदेश पुलिस के तत्कालीन एडीजी अजयराज शर्मा ने राज्य पुलिस के बेहतरीन 50 जवानों को छांट कर STF बनाई।

सीएम की सुपारी लेने की खबर से STF हरकत में आई और श्रीप्रकाश का मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगा दिया। श्रीप्रकाश को शक हो गया। अपनी दिल्ली की एक गर्लफ्रेंड से बात करने के लिए उसने मोबाइल की जगह पीसीओ का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, लेकिन पुलिस ने उसकी गर्लफ्रेंड के नंबर को भी सर्विलांस पर लगा रखा था और यह बात श्रीप्रकाश शुक्ला को नहीं पता थी।

एक दिन सर्विलांस से पता चला कि हाल ही में जिस पीसीओ से श्रीप्रकाश कॉल कर रहा है वो गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में स्थित है। STF की टीम तुरंत हरकत में आई और एक टीम फौरन दिल्ली के लिए रवाना हो गई।

आख़िरकार मारा गया श्रीप्रकाश शुक्ला

23 सितंबर 1998 को STF के प्रभारी अरुण कुमार को खबर मिली कि श्रीप्रकाश दिल्ली से गाजियाबाद की तरफ आ रहा है। श्रीप्रकाश की कार ने जैसे ही वसुंधरा इन्क्लेव पार की, अरुण कुमार सहित टीम उसके पीछे लग गई। उसकी कार जैसे ही इंदिरापुरम के सुनसान इलाके में दाखिल हुई, मौका मिलते ही STF की टीम ने श्रीप्रकाश की कार को ओवरटेक कर उसकी कार को रोक लिया।

पुलिस ने पहले श्रीप्रकाश को सरेंडर करने को कहा, लेकिन वह नहीं माना और फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस की जवाबी फायरिंग में श्रीप्रकाश मारा गया

इस तरह गुनाहों की दुनिया में महज़ 25 साल की उमर में दहशत पैदा करने वाले इस माफ़िया का अंत हो गया।

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