वक्त की दीवार पर लिखी इबारत को पहचानें मार्क्सवादी

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2:53 pm 19 May, 2016


मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में एक नाटक लिखी थी। इसका शीर्षक थाः “दुःसमय”। और उसके बाद जो कुछ भी हुआ, वह वाकई दुःसमय (दुर्दिन) ही साबित हुआ है।

मूल रूप से कवि और नाटककार बुद्धदेव को संभवतः भविष्य की विपरीत परिस्थितियों का अंदाजा हो गया था। इसकी झलक दुःसमय नाटक में देखने को मिलती है।

वर्ष 2011 में वामपंथियों ने लाल दुर्ग कहे जाने वाले पश्चिम बंगाल को खो दिया। उन्हें इस बात की आशा थी कि वह एक बार फिर वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों के बाद इस पर काबिज हो सकेंगे, लेकिन यह आशा पूरी तरह धूल-धूसरित हो चुकी है।

परिणाम उम्मीदों के विपरीत आए हैं। लेकिन हालात इस कदर खराब होंगे, यह वामपंथी विश्लेषकों और समीक्षकों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। वामदलों को पश्चिम बंगाल की जनता ने सिरे से खारिज कर दिया है। ऐसा लगता है कि मानो वे राज्य के राजनीतिक परिदृश्य से विदा लेने वाले हैं।

आखिर क्यों हुआ इतना बड़ा नुकसान ?

आमतौर पर गरीबों, किसानों, श्रमिकों, कर्मचारियों और कामगारों के हितों के पक्ष में आवाज उठाने वाले वाम नेता लगातार 35 सालों तक सत्ता में रहने के दौरान उनसे कटते चले गए थे। सत्ता में रहने की मजबूरियों ने मार्क्सवादियों की वैचारिकता को छिन्न-भिन्न कर दिया।

यह सत्ता में रहने की ही मजबूरी थी कि वाममोर्चा की तात्कालीन सरकार ने विकास की बात की और उन लोगों से जमीन वापस लेने की बात करने लगी, जिन्हें उसने जमीन आबंटित किए थे। अपने इस क्रियाकलाप से वह पूंजीवाद और उद्योगपतियों की समर्थक दिखने लगी, जिनको दरकिनार कर वह कभी सत्ता में आई थी।

ऐसे में सिंगूर जैसी घटना होने पर जहां पहले वामपंथी खड़े नजर आते थे, वहीं तृणमूल कांग्रेस खड़ी दिखाई पड़ने लगी। राज्य की वाम मिजाज जनता ने वामपंथी दलों की बजाय ममता बनर्जी को अपने पक्ष में खड़े संघर्ष करते पाया।

पश्चिम बंगाल को नजदीक से जानने वालों को यह बताने की जरूरत नहीं है कि इस राज्य में करीब पांच साल पहले तक बिना मार्क्सवादियों की इजाजत के एक पत्ता भी नहीं हिलता था। शायद ही देश के किसी भी इलाके में नौकरशाही और सरकार के इस तरह राजनीतिकरण की मिसाल मिलती हो।

गुजरे दशकों में जिस तरह कम्युनिस्ट शासित देशों में वामपंथ का फौलादी शिकंजा समाज और पूरी पीढ़ी पर कसा होता था, पश्चिम की राजनीति इसका परिष्कृत रूप थी। कॉलेज में दाखिले से लेकर नौकरी तक में मार्क्सवादी कैडर होना अपने आप में एक योग्यता हो गई थी। इसको जरूरी माना जाता था। यही वजह है कि राज्य में दलाल संस्कृति हावी हो गया।


वक्त बीतने के साथ मार्क्सवादी विचारधारा पर लंपटवाद ने अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी गुंडों और बदमाशों की शरणस्थली बन गई। अपना काम निकालने के लिए लोग पार्टी में घुसपैठ करने लगे।

आदर्शवादी लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा। हालात ऐसे बन गए कि माकपा के साधारण सदस्य भी अपने रसूख और गुंडई के बल पर लाखों में खेलने लगे। विरोध करने की स्थिति में सिर्फ राजनीतिक विरोधियों को ही नहीं, मार्क्सवादी कैडरों ने जनता को ही सबक सिखाना शुरू कर दिया। इनके लिए राजनीति और हिंसा एक-दूसरे के पूरक बन गए थे।

हालांकि, इसका अंत नजदीक था। नंदीग्राम और सिंगूर सरीखी घटनाएं मार्क्सवादियों पर भारी पड़ गईं। यहां हिंसा फैलाने को आतुर मार्क्सवादियों को जब जनता ने उनके ही लहजे में जवाब देना शुरू किया तो उनकी आंखें फटी रह गईं। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनके साथ कुछ इस तरह का हादसा होने जा रहा है।

जनता से ठुकराए गए मार्क्सवादियों को असली चुनौती अब मिली है। दरकते जनाधार के बीच मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए अपने सिमटते कुनबे को एकजुट रखना बेहद मशक्तत वाला काम होगा। अब फॉरवर्ड ब्लॉक से लेकर आरएसपी तक अपनी डफली-अपना राग अलाप सकते हैं।

बंगाल में खराब हालत के लिए मार्क्सवादियों का एक कुनबा बुद्धदेव भट्टाचार्य की नीतियों को जिम्मेदार ठहरा रहा है। इस गुट का मानना है कि बंगाल में विकास की बात छेड़कर पार्टी जनता की नजरों से गिरती चली गई। वहीं, एक गुट पराजय के लिए केन्द्रीय नेताओं को जिम्मेदार ठहरा रहा है। इन सबसे हटकर मार्क्सवादी दोषारोपण की बजाय, हार की समीक्षा करें तो बेहतर होगा।

अब समय आ गया है कि जब मार्क्सवादियों को वक्त की दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ना चाहिए। वैचारिक स्तर पर उन्हें वक्त के साथ बदलना था, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है। अब इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि जो काम वे 35 सालों में नहीं कर सके, वे अगले कुछ दिनों में कर लेंगे।

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