मालदा की फिजाओं में अब भी तैर रही है साम्प्रदायिक हिंसा की गंध

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12:57 am 8 Jan, 2016

मालदा की फिजाओं में साम्प्रदायिक हिंसा की गंध अब भी तैर रही है। झुलसे कालियाचक और आसपास के इलाकों में तनाव स्पष्ट रूप से बरकरार है। पूरे इलाके में आज भी धारा 144 लागू है। इसके बावजूद अलग-अलग स्थानों पर हिंसा और आगजनी की छिटपुट घटनाएं हो रही हैं।

पिछले रविवार को मुसलमानों की एक विशाल रैली में अचानक हिंसा भड़क उठी थी। यह रैली हिन्दू महासभा के नेता कमलेश तिवारी के पैगम्बर मोहम्मद के संबंध में कथित अपमानजनक टिप्पणी के विरोध में निकाली गई थी।

अंजुमन अहले सुन्नतुल जमात (एजेएस) ने बांटा था यह पर्चा।

अंजुमन अहले सुन्नतुल जमात (एजेएस) ने बांटा था यह पर्चा।

नेशनल हाइवे नंबर 34 पर मुस्लिम संगठन अंजुमन अहले सुन्नतुल जमात (एजेएस) के समर्थकों ने इसका आयोजन किया था, जिसमें 2.5 लाख से अधिक मुसलमान शामिल हुए थे। इसके लिए बकायदा पर्चे बांटकर भीड़ जुटाई गई थी। बाद में यह रैली हिंसक भीड़ में तब्दील हो गई, जिसने कई दर्जन वाहनों को आग के हवाले कर दिया, कालियाचक थाने में तोड़फोड़ की। उन्मादी भीड़ ने गोलियां चलाई, रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों को पीटा और करीब 25 हिन्दुओं के घरों में लूटपाट की।

मालदा में इतनी बड़ी वारदात होने के बावजूद राज्य की ममता बनर्जी सरकार चुप है। यह अलग बात है कि तमाम चिन्ताओं से अलग राज्य सरकार पाकिस्तानी गजल गायक गुलाम अली के प्रस्तावित कार्यक्रम का आयोजन करने में व्यस्त है। बंगाल में इसी साल मई में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और ममता बनर्जी की चुप्पी को वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर देखा जा सकता है।

पिछले दो महीनों में इन इलाकों में ममता बनर्जी चार जनसभाएं कर चुकी हैं, जिनमें लाखों की संख्या में लोग उपस्थित हुए थे। ममता बनर्जी की सरकार पर आरोप है कि यह दोषियों को बचा रही है। गौरतलब है कि अब तक 130 आरोपियों में सिर्फ 9 को गिरफ्तार किया जा सका है। इनमें से 6 को गिरफ्तारी के कुछ घंटों बाद ही जमानत भी मिल गई।


ममता बनर्जी इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया देकर मुसलमानों का रोष नहीं झेलना चाहतीं। पश्चिम बंगाल के कई जिलों में मुसलमान वोटर्स निर्णायक भूमिका में हैं। राज्य के 294 विधानसभा क्षेत्रों में से 70 ऐसे हैं, जहां मुस्लिम मतदाता विधायक और सांसद तय करते हैं।

माल्दा, मुर्शिदाबाद और नदिया जैसे जिलों में हिन्दू अल्पसंख्यक हो गए हैं। बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ और अन्य समाजशास्त्रीय कारणों की वजह से इन जिलों में मुसलमानों की आबादी करीब 60 फीसदी तक पहुंच गई है। इसके अलावा बंगाल के बर्दमान, हावड़ा, उत्तर एवं दक्षिण 24 परगना, पूर्व व पश्चिम मिदनापुर सरीखे जिलों में मुसलमान बहुसंख्यक हो गए हैं।

हाल के दिनों में ममता बनर्जी की सरकार ने ऐसे कई निर्णय लिए हैं, जिनसे यह साबित होता है कि यहां तुष्टीकरण की नीति को बढ़ावा मिला है।उदाहरण के तौर पर  राज्य सरकार ने पिछले साल दुर्गा पूजा विसर्जन पर सिर्फ इसलिए रोक लगा दी थी, क्योंकि विजयादशमी के दिन ही ईद भी मनाई जा रही थी।

मुस्लिम संगठनों ने मांग की थी कि दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन को एक दिन के लिए रोक दिया जाए।  इसी तरह की एक अन्य घटना में, वीरभूम जिले में हिन्दू बहुल एक गांव में पिछले तीन साल से दुर्गा पूजा करने की अनुमति सिर्फ इसलिए नहीं दी जा रही थी, क्योंकि इस पर स्थानीय मुस्लिम परिवारों को आपत्ति थी। इसी तुष्टीकरण की नीति के तहत बंगाल में मस्जिदों के इमामों और मुअज्जिनों को सरकार की तरफ से बकायदा वेतन और भत्ते दिए जाते हैं। सिर्फ यही नहीं, राज्य सरकार में काम करने वाले मुस्लिम कर्मचारियों को त्योहारों के नाम पर अलग से बोनस और भत्ते भी दिए जाते हैं।

कुछ दिन पहले मालदा में महिलाओं का एक फुटबॉल मैच महज इसलिए रद्द कर दिया गया था, क्योंकि स्थानीय मुसलमानों ने फतवा जारी करते हुए इस महिलाओं के खेलने पर आपत्ति जताई थी। मालदा में इस तरह के कई मजहबी वाकये देखने को मिले हैं। यही नहीं, हाल के दिनों में मालदा से लेकर मुर्शिदाबाद तक और नदिया से लेकर बर्दमान तक कई बम धमाकों की घटनाओं ने सुरक्षा एजेन्सियों की नीन्द हराम कर दी है।

इस बीच, केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह इसी महीने की 18 तारीख को मालदा का दौरा करेंगे। इससे पहले केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार से इस पूरे मामले की रिपोर्ट देने को कहा था।

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