मोची की बेटी ने नंगे पैर दौड़ कर जीता था स्वर्ण पदक, अब साथ में दौड़ेगा हिन्दुस्तान

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5:43 pm 3 May, 2016


यह कहानी एक ऐसी लड़की की है, जिसके हौसले को आज पूरा हिन्दुस्तान सलाम कर रहा है। उसने तमाम लोगों को यह सीख दी है कि तमाम अभावों के बाद भी अगर आपके पास कुछ कर दिखाने का जज्बा है, तो आप लाखों लोगों के प्रेरणासोत्र बन सकते हैं।

यह कहानी उस 14 साल की छोटी सी लड़की सयाली माहिशुने की है, जिसके पिता मंगेश माहिशुने मोची हैं। वह दिन-रात मेहनत कर के दूसरों के जूते मरम्मत तो करते हैं, लेकिन अपनी बेटी के लिए जूते खरीदने में भी असमर्थ हैं। लेकिन कहते हैं न कि उड़ने के लिए परों की नही, जज्बे की जरूरत होती है।

ठीक ऐसा ही हुआ। सयाली माहिशुने जब गर्म रेस के ट्रैक पर दौड़ी, तो उसके पांव में जूते नहीं थे। उसका अभाव उसके जज्बे के आगे ठंडा पड़ गया। उसे तो अभी उड़ना था।

सयाली माहिशुने को 25 मई से शुरू होने वाली प्रतियोगिता ‘अब दौड़ेगा  हिन्दुस्तान’ का अजय देवगन के साथ ब्रांड अम्बेसडर बनाया गया है।

अब दौड़ेगा हिन्दुस्तान की इस पहल के माध्यम से देश के उन तमाम प्रतिभावान एथलीट को एक प्लॅटफॉर्म उपलब्ध कराया जाएगा, जिन्हें अभाव के कारण मौका नहीं मिल पाता है। सयाली इस पहल को लेकर काफ़ी उत्साहित हैं। वह कहती हैंः

“साथ देने के लिए मैं डाबर-ग्लूकोज की आभारी हूं और मैं भारत के लोगों से आग्रह करती हूं कि अब दौड़ेगा हिन्दुस्तान जैसी पहल में शामिल हों और देश भर में मेरे जैसे युवा महत्वाकांक्षी एथलीटों के सपनों में हौसला भरने की मदद करें।”

बिना जूतों के उसके पैर जलने लगे और उसे दर्द भी हुआ पर सयाली ने भागना बंद नहीं किया।

सयाली ने आज से कुछ साल पहले अंडर-17 स्पर्धा में 3 हजार मीटर दौड़कर स्वर्ण पदक हासिल किया था। भारत की इस बेटी ने जब इंटर स्कूल एथलीट प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था, तब उसके पैरों मे जूते नहीं थे। लेकिन उसे रुकना नही था। वह नंगे पैर दौड़ी।


सयाली के पिता मंगेश दादर (ईस्ट) में सड़क किनारे बैठकर जूते सिलते हैं। बेटी की कामयाबी की खबर आई, तो उनकी आंखों में चमक आ गई।

“मुुझे पता था मेरी बेटी प्रतियोगिता में स्कूल का प्रतिनिधित्व कर रही है। मैं भी उसे देखना चाहता था, लेकिन जा नहीं सका, क्योंकि यहां बैठकर परिवार चलाने लायक कमाई करना ज्यादा जरूरी है। हां, लेकिन में इस यादगार पल को जरूर और यादगार बनाना चाहता हूं। मैं उसके लिए महंगे गिफ्ट तो नहीं खरीद सकता, लेकिन उसकी पसंदीदा चॉकलेट जरूर ले जाऊंगा। “

46 वर्षीय मंगेश सुबह से शाम तक काम करते हैं और 3 हजार से 10 हजार रुपए महीना कमाते हैं। उनकी कमाई घर खर्च पूरा नहीं कर पाती। यही कारण है कि वे बेटी को जूते भी नहीं दिला सके। बकौल मंगेश, मैं जो कुछ कमाता हूं, दोनों बेटियों की पढ़ाई पर खर्च हो जाता है। बड़ी बेटी मयूरी (17) आईटी में डिप्लोमा कर रही है।

सयाली के जज्बे को मेरा सलाम। उसने यह साबित किया है कि यदि रेसलाइन तक आने का मौका सभी को एक समान मिले, तो फिर आरक्षण की कोई जरूरत नहीं है। रेसलाइन तक लाना लोगो की जिम्मेदारी है. क्योंकि असमानता किसी भी समाज के लिए अभिशाप है।

मैं सयाली और उसके परिवार के लिए सुखद और मंगलमय भविष्य की कामना करता हूं।

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