बिहार में नीतीश और लालू के लौटने का मतलब

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11:39 pm 1 Nov, 2015

बिहार में विधानसभा चुनाव नतीजों के 48 घंटे से अधिक बीत चुके हैं। इस राज्य की राजनीति में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव की वापसी के कई निहितार्थ हैं। राजनीतिक पंडितों और प्रबुद्ध वर्ग ने इस जीत को सुशासन के पक्ष में जनता का फैसला बताया है। साथ ही इस बात के दावे किए जा रहे हैं कि बिहार में जातिगत समीकरण ध्वस्त हो गए हैं और जनता ने जातीय गोलबंदी को अधिक तवज्जो नहीं दी है। राजनीति पंडितों के ये दावे सच्चाई से बहुत दूर हैं।

1. बिहार में जातीय समीकरण की जीत

इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि बिहार ने इन चुनावों में जातीय समीकरण पूरी तरह हावी रहा। विकास और सुशासन सिर्फ हवाई बातें थीं। जो लोग यह दावे कर रहे हैं कि बिहारी मतदाताओं ने नीतीश के सुशासन के पक्ष में मतदान किया है, वे इस सच्चाई से मुंह मोड़ रहे हैं कि 116 सीटों वाली जनता दल-युनाईटेड को 71 सीटों पर समेट दिया गया है। इस पार्टी को 45 सीटों का नुकसान हुआ है।

और इसी तरह लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने 25 से 80 सीटों का सफर तय किया है। लालू यादव जैसे घोर जातिवादी राजनीति के धुरन्धर, जिन्होंने नतीजों के ठीक एक दिन पहले बड़े ही ठाठ से कहा था कि वोटिंग के दौरान अपर कास्ट भोथर हो गया था, विकास पुरुष कब से हो गए?

2. नीतीश की चुनौतियां बढ़ीं

बहरहाल, नीतीश कुमार की चुनौती बढ़ गई है। वह ऐसे सरकार में मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, जहां उनकी पार्टी की सीट कम है। कुल मिलाकर बिहार सरकार का रिमोट कन्ट्रोल लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के पास होगा।

बिहार के लिए लालू राज के 15 साल का अनुभव कुछ ठीक नहीं है। ऐसे में नीतीश अपनी मर्जी का कितना कर सकेंगे, यह तो वक्त ही बताएगा।

3. मोदी-अमित शाह के लिए सबक


बिहार चुनाव के नतीजे नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के लिए सबक है। केन्द्रीय राजनीति के लिए यह जोड़ी सर्वोत्तम है, लेकिन जहां तक राज्य की राजनीति की बात तो उन्हें सभी राज्यों में अगरी पंक्ति के नेताओं को तैयार करना होगा, जो सक्षम हों और सशक्त हों।

संगठन और काम काज में आमूल-चूल परिवर्तन की जरूरत होगी। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के लिए संघ और इसके अनुषांगिक संगठनों के साथ तालमेल रखना एक चुनौती होगी।

4. केन्द्र और बिहार में तालमेल का अभाव

यह बिहार का दुर्भाग्य है कि आजादी के बाद से ही केन्द्र और राज्य सरकार के बीच तालमेल का अभाव रहा है। जब इन्दिरा गांधी का शासनकाल था, तब बिहार में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन चलाए जा रहे थे। इसी तरह अटल बिहारी वाजयपेयी के कार्यकाल में बिहार में लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे, जिनकी वाजपेयी सरकार से बनती नहीं थी।

डॉ. मनमोहन सिंह के दस साल के कार्यकाल के दौरान यहां जनता दल युनाईटेड और भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी। राज्य में इस सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे। और अब जब केन्द्र में भाजपानीत सरकार है, तब बिहार में लालू यादव की वापसी हो रही है।

कुल मिलाकर आने वाले दिनों में बिहार में विकास की संभावना को खोजना मुश्किल है।

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