महज एक रात में निर्मित हुआ था विशालकाय भोजेश्वर शिव मंदिर

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12:07 pm 30 Dec, 2015

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 32 किलोमीटर की दूरी पर ‘रायसेन’ जिले में स्थित यह मंदिर ‘उत्तर भारत का सोमनाथ’ कहा जाता है। यह भोजपुर से लगती हुई पहाड़ी पर एक विशाल, किन्तु अधूरा शिव मंदिर है।

भोजेश्वर महादेव अपने आप में एक अनूठा शिव मंदिर है। इसका निर्माण सिर्फ एक रात में किया गया था। और इसे अधूरा भी सिर्फ इसलिए छोड़ दिया गया क्योंकि निर्माण होते-होते सुबह हो गयी थी। हालांकि इसके पीछे के स्पष्ट कारण के बारे में कोई नहीं जानता।

महाभारत काल से भी जुड़ा हुआ है मंदिर का इतिहास

मंदिर और इसमें मौजूद शिवलिंग की स्थापना धार के प्रसिद्ध परमार राजा भोज द्वारा की गई थी। परन्तु स्थानीय मान्यता के अनुसार माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण ‘प्रथमतः’ पांडवों द्वारा माता कुंती की पूजा के लिए किया गया था। कुछ अन्य जनश्रुतियों के अनुसार सूर्यपुत्र कर्ण को कुंती ने मंदिर नजदीक बहने वाली बेतवा नदी के इसी तट पर विसर्जित कर दिया था। 11वीं शताब्दी में परमार वंशीय राजा भोजदेव ने भगवान शिव की प्रेरणा द्वारा पुनर्निर्माण करवाया था। राजा भोज कला, स्थापत्य और विद्या के महान संरक्षक थे।

प्राच्य स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है यह मंदिर

यह मंदिर वर्गाकार है, जिसका बाह्य विस्तार बहुत बडा़ है। मंदिर चार स्तंभों के सहारे पर खड़ा है और देखने पर इसका आकार किसी हाथी की सूंड के समान लगता है। यहां मौजूद शिवलिंग दुनिया का सबसे विशाल शिवलिंग है, जो कि एक ही पत्थर से निर्मित है। इस मन्दिर की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका चबूतरा 35 मीटर लम्बा है। इस विशालकाय देवालय के सम्पूर्ण शिवलिंग की लम्बाई 18 फीट और व्यास लगभग 8 फीट का है। यदि सिर्फ शिवलिंग की ऊँचाई लें, तो भी यह अकेले 12 फिट ऊंचा है। काफी प्राचीन होने के कारण यह शिवलिंग छत का पत्थर गिरने से खंडित हो गया था। जिसे पुरातत्व विभाग ने जोड़ कर पुनर्स्थापित कर दिया था।


इस शिव मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी अधूरी गुम्बदाकार छत भारत की प्राचीन स्थापत्य कला के कई राज खोलती है। ग्यारहवीं शताब्दी के इस मंदिर की गुंबदनुमा छत इस्लामी स्थापत्य कला के भारत से प्रभावित होने की संभावना भी दर्शाती है। क्योंकि इस मंदिर के निर्माण के काफी सालों बाद ही इस्लामी राज भारत आया था। इसे भारत की सबसे पहली गुम्बदीय छत वाली इमारत के रूप में भी जाना जाता है।

हाइली एडवांस टेक्निक का किया गया है उपयोग

इस विशाल मंदिर में प्राचीरों पर 80-80 टन के विशाल स्ट्रक्चर्स की उपस्थिति आपको दाँतों में उंगली दबाने को मजबूर कर सकती है। बगैर मशीनों और विद्युतीय यंत्रों के ये कैसे सम्भव हो सका! इस प्रश्न का उत्तर है,दरअसल मंदिर के पश्च भाग में बना ढलान बनाया गया है, जिसका उपयोग निर्माणाधीन मंदिर के समय विशाल पत्थरों को ढोने के लिए किया गया था। यह निर्माण का अपने आप में दुर्लभतम नमूना है। इस मंदिर का दरवाजा किसी हिंदू भी इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है।

पार्वती की गुफा है पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र

मन्दिर से कुछ दूरी पर बेतवा नदी के किनारे पर माता पार्वती की गुफ़ा है। श्रद्धालुओं में इस गुफा के प्रति बेहद भक्तिभाव देखा जा सकता है। गुफ़ा नदी के दूसरी तरफ है, इसलिये नदी पार जाने के लिए नौकाएं उपलब्ध हैं। यही वजह है कि पर्यटक नौका विहार का भी लुफ्त उठाते देखे जा सकते हैं। मंदिर के पश्चिम में स्थित इस गुफा का पुरातात्विक महत्त्व काफी है।

सिर्फ शिवलिंग ही नहीं, विभिन्न देवताओं की प्राचीन मूर्तियों से भी सज्जित है

मंदिर के गर्भगृह के विशाल शीर्ष स्तंभ में शिव-पार्वती,भगवान लक्ष्मी-नारायण, ब्रह्मा-सावित्री और सीता-राम की मूर्तियां स्थापित हैं। बाहरी दीवार पर यक्षों की मूर्तियां श्रद्धालुओं को खासा प्रभावित करती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भीम घुटनों के बल बैठकर इस ऊंचे शिवलिंग का अभिषेक करते थे। मंदिर के विशाल दरवाजों में देवी गंगा और यमुना के प्रतीकात्मक चित्र उत्कीर्णित हैं। मंदिर परिसर के भीतर ही संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान् आचार्य माटूंगा का समाधि स्थल भी हैं। इस मंदिर में और भी बहुत कुछ बनाना शेष था, परन्तु इसे अधूरा ही छोड़ दिया गया।

मेलों में उमड़ता है श्रद्धालुओं का हुजूम

भोजेश्वर महादेव मंदिर में साल में दो बार मकर संक्रांति व महाशिवरात्रि पर्व के समय वार्षिक मेलों का आयोजन किया जाता है। ये आयोजन स्थानीय प्रशासन द्वारा कराये जाते हैं, जिसमें सिर्फ भोपाल या आस-पास के ही नहीं, पूरे देश से श्रद्धालुगण पहुँचते हैं।

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