लड़के के चाहत में लगाई सेंचुरी; शादी, समारोहों में नहीं करता है कोई आमंत्रित

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6:09 pm 21 Dec, 2015

पहले तो लड़के की चाहत में शतक लगा लिया और अब गांव वालों के ताने सुनने पड़ रहे हैं। यहां तक कि ऐसा करने वालों को ग्रामीणों ने अघोषित रूप से बहिष्कृत कर दिया है। इन लोगों को न तो शादियों में और न ही अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाता है। मामला है अहमदाबाद के ववाद गांव में रहने वाले भभोर परिवार का। दरअसल, इस परिवार में लड़कों की चाहत में 100 से अधिक सदस्य हो गए हैं।

नरसी भभोर, भभोर परिवार के मुखिया हैं। इनके 11 बच्चे हैं, जिनमें पांच लड़कियां शामिल हैं। नरसी के बेटे संशु कहते हैंः

“पूरा परिवार जब किसी भी उत्सव के लिए एक साथ होता है, तो एक बावर्ची की आवश्यकता होगी। साथ ही छोटे बच्चों पर नजर रखना काफ़ी मुश्किल हो जाता है, इसलिए हमें गांव का कोई भी किसी सामाजिक समारोह में पूरे परिवार को आमंत्रित नही करता है। “

नरसी कहते हैं कि उन्हें परिवार नियोजन के बारे में जानकारी नहीं है। वैसे नरसी अकेले नहीं हैं, जिनके 10 या उससे अधिक बच्चे हैं। इस राज्य में 8,000 से अधिक परिवार हैं, जिनकी यही स्थिति है।

अगर आकड़ों पर नज़र डाले, तो पता चलता है की 42 लाख परिवार ऐसे हैं, जिनके एक या उसके अधिक संतानें हैं। अब देर से ही सही, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को होश आया और उन्होंने परिवार नियोजन के विभिन्न तरीकों के बारे में लोगों को शिक्षित करने के लिए गांव-गांव जाना शुरू कर दिया है।

दिलचस्प बात है कि, लगभग 1.48 करोड़ परिवारों में से सिर्फ़ 25.51 लाख परिवारों के ही एक संतान हैं। इन 25.51 लाख परिवारों में से 15.37 लाख परिवार ऐसे हैं जिनकी संतान बालक हैं, जबकि शेष केवल लड़की ही है। इससे अलग 20.53 लाख परिवार ऐसे हैं, जिनकी दो संतानें हैं और इन 20.53 लाख परिवार में से 15.37 लाख परिवार ऐसे हैं, जिनकी दोनों संतान बालक हैं। जबकि सिर्फ 5.16 लाख परिवार ऐसे हैं, जिनकी दोनों संतान बालिका हैं।

दिलचस्प बात यह भी है कि केवल लड़कियों वाले परिवारों की तुलना में केवल लड़कों वालों परिवारों की संख्या 50 फीसदी से अधिक है। इनमें से अधिकतर परिवार ऐसे हैं, जिन्होंने लड़कों की चाहत में कई लड़कियों को जन्म दे दिया।


 

समाजशास्त्री गौरांग जानी कहते हैंः

“हम पांच भाई हैं और मेरी उम्र 50 से अधिक हो गई है। वर्तमान में ऐसे परिवार जिनकी सिर्फ़ एक संतान है और वह बालक है, तो उन्हें सम्मान की नज़र से देखा जाता है। साथ ही उन्हें भाग्यशाली समझा जाता है। लेकिन इसके उलट अधिक बालिकाओं वाले परिवार यह संकेत देते हैं की उन परिवारों में एक या उससे अधिक बालक संतान की चाहत है।”

 

जन स्वास्थ्य अभियान की सदस्य रेणु खन्ना मानती हैंः 

“अब प्रवृत्ति बदल रही है। लोग अब छोटे परिवार चाहते हैं। बड़े परिवार में अब वो लोग हैं जो या तो पुराने हैं या आदिवासी। आदिवासी अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर निश्चिंत नहीं होते, इसलिए उनके परिवार में संतानो की संख्या बढ़ जाती है।”

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