यह हिमाचली शहर नहीं मनाएगा दशहरा, जानिए आखिर क्यों।

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2:58 pm 30 Sep, 2015

रावण को हम सभी महान काव्य-ग्रन्थ रामायण के एक प्रमुख चरित्र और सशक्त खलनायक रूप में जानते हैं। रामकथा में रावण एक ऐसा चरित्र है, जो भगवान राम की खूबियों को उभारने का काम करता है। इसे रावण का एक गुण भी मान सकते हैं। भले ही कुछ लोग सुनियोजित तरीके से इसे मिथक का नाम देते हैं, लेकिन रामायण की कथा सच्ची घटना पर आधारित है, जिसमें राम, सीता और हनुमान के साथ ही अन्य पात्रों की महती भूमिका रही है। महर्षि बाल्मिकी द्वारा रचित इस धर्मग्रन्थ का भारत के समाज पर गहरा आध्यात्मिक और धार्मिक प्रभाव है। यह ग्रन्थ महत्वपूर्ण सामाजिक सन्देश भी देता है।

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एक ऐसे समय में जब पूरा देश दशहरा की तैयारियों में व्यस्त है, हिमाचल प्रदेश का एक छोटा सा शहर बैजनाथ में रावण के पुतला दहन की चर्चा तक नहीं हो रही। ऐसा नहीं है कि यह माहौल यहां सिर्फ इस बार है। दरअसल, बैजनाथ में कभी दशहरे का त्यौहार मनाया ही नहीं जाता। इस परिघटना के पीछे एक ऐतिहासिक कथा है।

मान्यताओं के मुताबिक, रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था। दशानन रावण ने शिव की अर्चना करते हुए, उन्हें कई अपना सिर काटकर अर्पित कर चुका था। इससे प्रसन्न होकर भोले शंकर ने न केवल उसे जीवनदान दिया, बल्कि उसे अमर होने का वरदान भी दे डाला।

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लेकिन शिवभक्त रावण को इससे कुछ अधिक चाहिए था। उसने भगवान जटाधारी से गुजारिश की कि वे उसके साथ लंका चलें और वहां निवास करें। भगवान शिव इसके लिए तैयार हो गए और एक लिंग में परिवर्तित हो गए, ताकि रावण उन्हें अपने साथ लंका ले जा सके। लेकिन इसके साथ ही भगवान भोले शंकर ने एक शर्त रखी थी कि कैलाश से लंका तक की यात्रा के दौरान रावण इस लिंग को कहीं जमीन पर नहीं रखेगा। ऐसा होने की स्थिति में जहां लिंग रखा जाएगा, भगवान शंकर वहीं निवास करेंगे।

रावण ने इस शिवलिंग के साथ अपनी यात्रा शुरू की और बैजनाथ तक पहुंचा। मान्यताओं के मुताबिक इस स्थान पर आकर रावण ने नित्य कर्म से निवृत्त होने की सोची। इसी दौरान उसे एक गड़ेडिए दिखा। उसने गड़ेडिये से गुजारिश की कि वह शिवलिंग को थोड़ी के लिए थाम ले, तब तक वह नित्यकर्म से फारिग होकर वापस आ जाएगा। गड़ेड़िए ने शिवलिंग को थामा, लेकिन वह इसका भार सहन नहीं कर सका और मजबूरी में उसे शिवलिंग को जमीन पर रख देना पड़ा। इस तरह बैजननाथ में भगवान शिव का निवासस्थल बन गया।

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कालान्तर में 13वीं शताब्दी में इस प्राचीन शिवलिंग पर मंदिर का निर्माण किया गया, जो हिन्दुओं के एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में प्रचलित है। बैजनाथ नामक यह छोटा सा शहर मंडी और पालमपुर के बीच स्थित है, जो कांगरा से सिर्फ 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। प्रतिवर्ष यहां हजारों की संख्या में शिवभक्त आते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं।

बैजनाथ के लोग दशहरे के दिन रावण का पुतला नहीं जलाते, क्योंकि यहां मान्यता है कि रावण ही वह व्यक्ति था, जिसने भगवान शिव को यहां तक लाया था। रावण अपने व्यक्ति जीवन में भले ही एक बुराई का पुतला था, लेकिन यहां के लोग भगवान शिव से जुड़ी इस कथा की वजह से उसे इज्जत देते हैं। रावण का पुतला न जलाना एक तरह से उसे धन्यवाद ज्ञापन करना है।

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