दिल्ली की अचला शर्मा बन गई हैं देेसी कुत्तों का सहारा, पाल रखे हैं हजारों

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3:55 pm 16 May, 2016


कुत्तों का अपने मालिक के प्रति वफादारी के किस्से तो आपने खूब सुने होंगे। कुत्तों के इसी गुण के कारण वे घरों में खूब पाले जाते थे। लेकिन लोगों में विदेशी चीजों की चाहत कुछ इस कदर बढ़ी कि कुत्ते भी विदेशी भाने लगे। अब कुत्तों के नाम मोती नहीं, मैक्स रखे जाते हैं। शेरू नहीं शैडो ठीक लगता है।

कुत्ते पालने का शौक तो पहले भी था, लेकिन आजकल कुत्तों पर तो लोगों को इतना खर्चते देख आम आदमी अनायास कह पड़ता है – काश हम कुत्ते ही होते।

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आम आदमी की इस दुविधा पर कवि चोंच ने क्या खूब लिखा हैः

“मानुस हौं तो वही कवि चोंच बसहुं सिटी लंदन के ही द्वारे।
जौं पशु हौं तो बनहुं बुलडॉग फिरहुं कार में नित पूछ निकारे।।”

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सही भी है, किसी को बुलडॉग पसंद है, तो किसी को जर्मन शेफर्ड। इन कुत्तों को खरीदने के लिए लोग करोड़ो रुपए खर्चने से भी नहीं कतराते। आखिर सोसाइटी में साख भी तो इसी से बनेगी।

जिसके पास जितना महंगा कुत्ता उतना बड़ा वह रईस। वैसे लोगों के इस शौक से मुझे कोई परेशानी तो नहीं है। लेकिन जिस देश में लोगों को खाने के लाले पड़े हैं, उस देश में AC में बिठाकर इन कुत्तों को चिकन खिलाने की बात भी तो नहीं पचती।

चलो एक पल के लिए मान भी लें कि इन पैसे वालों ने गरीबों का ठेका नहीं ले रखा है, इन्हें कुत्तों से प्यार है। तो साहब देसी कुत्तों को क्यूं अपने चौकीदर से नस्लवादी लात लगवाते हो? अरे आदमी तो आदमी अब क्या देश के कुत्ते भी आपको नहीं पसंद?

आपको बुलडॉग अच्छे लगते हैं। अरे काहे के बुलडॉग बड़ा सा मुंह और लटके गलफड़े आपको भा गए, खड़े कान वाला जर्मन शेफर्ड आपको अच्छा लगता होगा मुझे तो सियार जैसा लगता है। बस अपना-अपना नजरिया है।

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पेशे से नर्स अचला लाल शर्मा का नजरिया भी कुछ ऐसा ही है। इन्हें तथाकथित हाई ब्रीड वाले कुत्ते नहीं बल्कि देसी कुत्तों से प्यार है। इन्होंने कुत्ते पाल रखे हैं। एक दो नहीं बल्कि हजारों।

दिल्ली की सड़कों पर इनकी मैरून रंग की गाड़ी देखकर कुत्ते दौड़ पड़ते हैं। गाड़ी से उतरते ही कुत्ते इनसे लिपट जाते हैं ठीक वैसे ही जैसे कोई भूखा बच्चा अपनी मां से।

अचला पिछले 15 सालों से सड़क पर रहने वाले इन कुत्तों को न केवल दोनों टाइम खाना खिलाती हैं, बल्कि बीमार कुत्तों का इलाज भी करती हैं।

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इन्होंने इन बेज़ुबानों के लिए ‘कनक फाउंडेशन’ के नाम से एक संस्था भी खोली है। इनकी तीन टीमों में 15 से 20 लोग काम करते हैं। इन्हें इस काम के लिए कहीं से कोई आर्थिक मदद नहीं मिलती, लेकिन इन सब की परवाह किए बगैर अचला अपने पैसों से इस मुहिम को चला रही हैं।

इस काम में हर महीने 1 से 1.50 लाख रुपए का खर्च आता है, जो इनके परिवार वाले वहन करते हैं। ये पूछे जाने पर कि लोग उनके काम को कैसे देखते हैं तो वह कहती हैं कि “लोग मुझे पागल कहते हैं”।

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अगर आप इनके साथ जुड़ना चाहते हैं या फिर इनका सहयोग करना चाहते हैं तो इन नंबरों (9868119934, 011-24622021) पर संपर्क कर सकते हैं। अचला का ईमेल आईडी हैः [email protected]

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